बोलना और सुनना👂
कई लोग इतना बोलते है, जैसे बोलने के लिए ही पैदा हुए हो, और कई मात्र नाम के लिए ही बातें करते हैं। ज्यादातर लोग सुनने की बजाय बोलने में विश्वास करते है। शायद इसलिए कहा जाता है कि आज बोलने वालो की कमी है, बळिक कमी सुनने वालों की है। गांधी जी के अनुसार, '' ना बोलना का मुझे सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि मैं शब्दों की मितव्ययता सीख गया हूँ। करते है कि कम बोलना हर हाल में लाभदायक होता है। बोल कर हम जितने विचार प्रकट करते हैं, कम या ना बोल कर उससे कई गुना अधिक विचार अपने मन 💕 में तैयार कर सकते हैं।
फ्रैंक बेटगर के अनुसार - " हमें मनुष्य से नफरत होती हैं, जो अपने दिमाग के इंजन को चालू किए बिना ही मुंह 👄 को टाॅप गियर में ले जाते है। ज्यादा बोलना सभी सामाजिक दोषों में सबसे बुरा है। अगर आप में यह दोष है, तो आपका सबसे अच्छा दोस्त आपको यह बात नहीं बताएगा, मगर वह आप से बचता रहेगा''।
एक यहूदी कहावत है कि *समझदार कहता एक शब्द है और सुनता दो शब्द है। " इसी का उदाहरण हैं #फ्रासिंस ओ नील #।
फ्रासिंस ओ नील ने अपना Career एक Paper Sellsman के रूप में शुरू किया था। और इसके बाद कडी और निरंतर मेहनत से उन्होंने देश में बहुत बड़ा Business शुरू कर लिया। उनकी केवल एक खासियत थी कि वह बहुत कम बोलते थे, पर सुनते ज्यादा थे।
औ अंत में खास बात " फ्रैंट बेटगर " का यह भी कहना है कि "लोकप्रियता का Shortcuts यह है कि आप हर आदमी 👨 को अपने कान 👂 उधार दें, बजाय इसके कि आप अपनी जीभ 😜 उधार दें, प्रकृति ने भी शायद इसलिए हमें दो 👂 दिए हैं, लेकिन जीभ 😜 उसने एक ही दी है। 👍🙏
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