#भागी हुई लकडियां#

#बंद समाजों, कुंठित घरों और  मर्दो के आदेश पर चलने वाले परिवार की लड़कियां हमेशा लड़के के लिए ही नहीं भागती, ना शादी के लिए भागती है। वे जिंदगी में बस थोड़ा सा आजाद होने के लिए भाग रही होती हैं। वे बस अपने भाई जितना आजाद होने के लिए भागती है। वे बस थोड़े से सपने देख सकने, थोड़ा सा इंसान हो सकने के लिए भागती है। जैसे एक कविता #भागी हुई लड़कियां# में लिखा था कि जब भी भागती है कोई लड़की, तो जरुरी नहीं कि साथ में कोई लड़का भी भागा होगा।सच तो यह है कि हर बार प्रेम के लिए नहीं भागती लड़कियां। वे सिर्फ जिंदा रह सकने के लिए भी भागती है। यह भागना अनेक बार दुर्भाग्य  भी लेकर आता है, लेकिन जिस घर से भागी थी वो, वहां भी कौन सा सौभाग्य आया था उनके हिस्से? जैसे पैदा हुई, जैसे पाली गई, दुर्भाग्य  कहीं उनका पीछा नहीं छोड़ेगा। बाप के लिए वे इंसान नहीं, बळिक घर की इज्जत होंगी। जिससे प्रेम करेंगी, उनके लिए प्यार नहीं, भोगने वाली देह होगी। जिस घर में ब्याही जाएगी, सेवा करने वाली दासी होंगी। लड़कियों का दुर्भाग्य,  उनके भागने ने नहीं, उनके घर ने, इस समाज ने, इसके मूल्यों,संस्कारो और परवरिश ने उसी दिन लिख दिया था, जिस दिन वे पैदा हुई थी। #हमारी लड़कियां इसलिए भी भागती है, क्योंकि  वे अपनी माँ जैसी जिंदगी नहीं जीना चाहती ।#

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