मैं जब भी अकेले बैठकर तुमको याद करती हूँ। मैं रोना -मुस्कराना दोनों साथ करती हूँ।

बातें तो हम सभी करते हैं। पर खुद से बात -चीत हम कभी कभी करते है, और जब लड़कियाँ अपने आप से बात -चीत करती है वो खुद से मुकम्मल बात -चीत कर सकती हैं।

इस पर एक शायरी आप सभी के लिए  है....

अकेले बैठकर तुमको कभी जब याद करती हूँ।
हाँ, याद करती हूँ, मैं रोना -मुसकुराना दोनों साथ करती हूँ।

@ यही सोफे पे बैठे सात अम्बर घूम आती हूँ।
तुम्हारा नाम चखती हूँ नशे में झूम जाती हूँ।
कहाँ हूँ मैं जहाँ मेरी खबर मुझतक नहीं आती,
क्या मेरी गुमशुदकी ये खबर तुमतक नहीं जाती।
गली दिल की तुम्हारी याद से आबाद करती हूँ,
अकेले बैठकर तुमको कभी जब याद करती हूँ।
मैं तुमको याद करती हूँ, हाँ, तुमको याद करती हूँ,
मैं रोना -मुसकुराना दोनों साथ करती हूँ।
@ तेरा जाना मेरे आँखों में प्यासे खवाब बोता है,
तेरा तकिया लिपटकर मुझसे सारी रात सोता है।
तेरी खुशबू  मेरी साँसों की गोलियों में टहलती है,
बड़ी कमबख़्त है ये याद आँखो में पिघलती है।
सारी रात सोना -जागना, मैं सारी रात सोना जागना एक साथ करती हूँ,  कभी जब याद करती हूँ, हाँ,,, तुमको याद करती हूँ, मैं रोना -मुसकुराना दोनों साथ करती हूँ।

@ तेरी बातों के फूलों से गज़ल मख़दूम करती हूँ,
मैं चुपके से तेरी DP को जब भी Zoom करती हूँ।
तेरी फुके हुए cigrate मैं अक्सर राख होती हूँ,
तेरी लत में कभी धुआँ, कभी मैं खाँक होती हूँ।
मैं अपने जख़्म पे अशकों के खुद बरसात करती हूँ।
अकेले बैठकर तुझको कभी जब याद करती हूँ,
हाँ, तुमको याद करती हूँ, मैं रोना -मुसकुराना दोनों साथ करती हूँ, हाँ, दोनों साथ करती हूँ।।। ✌🙏😊

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